बलरामपुर ब्युरो @किसी गांव की तस्वीर अगर विकास की कहानी बताती है तो उसे देखकर खुशी होती है… लेकिन बलरामपुर जिले के सरगवां क्षेत्र से सामने आई तस्वीरें विकास की नहीं, बल्कि बेबसी, दर्द और सिस्टम के लंबे इंतजार की कहानी कहती हैं।
यहां एक तरफ एक बीमार पहाड़ी कोरवा महिला को बांस की झेलेगी में डालकर दो लोग अपने कंधों पर उठाए हुए दिखाई देते हैं। तो वही दूसरी तरफ दर्जनों ग्रामीण हाथों में थाली लेकर बम्हनी नाले के किनारे खड़े हैं और सड़क-पुलिया की मांग को लेकर मानो व्यवस्था से भीख मांग रहे हैं।
एक तस्वीर में जिंदगी बचाने की जद्दोजहद है…दूसरी तस्वीर में जिंदगी आसान बनाने के लिए वर्षों से चल रही लड़ाई।और इन दोनों तस्वीरों के बीच खड़ा है एक सवाल
आखिर बम्हनी नाले पर एक पुलिया के लिए ग्रामीणों को कितने साल और इंतजार करना पड़ेगा?बीमार महिला को अस्पताल ले जाना था लेकिन गांव तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं
घटना की तस्वीर जितनी साधारण दिखाई देती है, उसके पीछे की मजबूरी उतनी ही दर्दनाक है।
एक पहाड़ी कोरवा महिला की तबीयत बिगड़ने के बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ी। परिजनों ने 108 एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक बम्हनी नाले पर पुलिया नहीं होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी..अब परिवार के सामने दो ही रास्ते थे…या तो मरीज को वहीं छोड़ दिया जाए
या फिर खुद उसे कंधे पर उठाकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाए।आखिरकार परिवार ने दूसरा रास्ता चुना।बीमार महिला को बांस की झेलेगी में लिटाया गया। दो लोगों ने झेलेगी को कंधे पर उठाया और शुरू हो गया करीब 3 किलोमीटर का पैदल सफर।
जिस वक्त मरीज को एंबुलेंस के भीतर ऑक्सीजन और मेडिकल मदद मिलनी चाहिए थी, उस वक्त उसके परिजन उसे कंधों पर लेकर रास्ता तलाश रहे थे।
सोचिए… बीमारी से लड़ रही महिला के लिए अस्पताल तक पहुंचना ही एक अलग परीक्षा बन गया।सड़क नहीं, पुलिया नहीं… तो एंबुलेंस भी बेबस
ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि बम्हनी नाले पर पुलिया नहीं होने के कारण गांव का संपर्क बारिश के दिनों में बुरी तरह प्रभावित हो जाता है।
नाला सामान्य दिनों में किसी तरह पार हो जाता है, लेकिन बारिश होते ही इसका स्वरूप बदल जाता है। पानी बढ़ता है और गांव तक पहुंचने वाला रास्ता मुश्किल हो जाता है।ऐसे में सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होती है जिन्हें तत्काल इलाज की जरूरत होती है।मरीज इंतजार नहीं करता… बीमारी इंतजार नहीं करती… लेकिन यहां रास्ता जरूर इंतजार करवाता है।और यही इंतजार कभी-कभी जिंदगी पर भारी पड़ सकता है।दूसरी तस्वीर और भी ज्यादा आनोखा हाथ में थाली, जुबान पर पुलिया की मांग अगर पहली तस्वीर सिस्टम की मजबूरी दिखाती है, तो दूसरी तस्वीर सिस्टम के सामने ग्रामीणों की बेबसी को उजागर करती है।
बम्हनी नाले के किनारे दो दर्जन से ज्यादा ग्रामीण हाथों में थाली लेकर खड़े दिखाई दिए।लेकिन इन थालियों में खाना नहीं था।इन थालियों में थी वर्षों पुरानी मांग।ग्रामीणों ने विरोध का ऐसा तरीका चुना, जिसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया।
उनका कहना है…
“25 साल से मांग कर रहे हैं। अगर सड़क-पुलिया देना ही है तो अब भीख में ही दे दो।”यह वाक्य शायद छोटा है, लेकिन इसके पीछे वर्षों का गुस्सा, दर्द और निराशा छिपी है।किसी ग्रामीण के लिए अपने गांव में सड़क और पुलिया मांगना कोई असाधारण मांग नहीं होनी चाहिए।लेकिन जब यही बुनियादी सुविधा वर्षों तक नहीं मिलती, तो आखिरकार लोगों का धैर्य जवाब देने लगता है।
थाली में खाना होना चाहिए था, लेकिन ग्रामीणों ने उसमें अपनी बेबसी रख दी जिस थाली में किसी परिवार का खाना होना चाहिए…जिस थाली में बच्चों के लिए रोटी होनी चाहिए…जिस थाली में घर की जरूरतें पूरी करने का सपना होना चाहिए…
आज उसी थाली को ग्रामीणों ने विरोध का हथियार बना दिया।ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अधिकारियों से गुहार लगाई। जनदर्शन में अपनी बात रखी। जनप्रतिनिधियों के सामने समस्या बताई। चुनाव के समय भी सड़क और पुलिया का मुद्दा उठाया।
हर बार उम्मीद जगी।हर बार आश्वासन मिला।
लेकिन नाला आज भी वहीं है।पुलिया आज भी नहीं है।और ग्रामीणों की परेशानी भी आज तक खत्म नहीं हुई।बारिश में गांव नहीं, मानो पूरी जिंदगी ‘बंधक’ हो जाती है बम्हनी नाला गांव के बीचो-बीच बहता है। बारिश के दिनों में जब नाले का पानी बढ़ता है तो ग्रामीणों के मुताबिक संपर्क व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो जाती है।
इस इलाके में विशेष पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवा परिवार भी निवास करते हैं।ग्रामीणों के अनुसार यहां 500 से ज्यादा आबादी ऐसी स्थिति का सामना करती है, जिसमें बारिश के दौरान रोजमर्रा की जिंदगी तक प्रभावित हो जाती है।बच्चों के सामने स्कूल जाने की समस्या।परिवारों के सामने राशन और जरूरी सामान की समस्या।बीमार लोगों के सामने अस्पताल पहुंचने की समस्या।और बुजुर्गों के सामने सुरक्षित आवागमन की समस्या।
एक नाला…लेकिन उसके कारण प्रभावित हो रही है पूरी जिंदगी।बच्चे स्कूल जाएं तो कैसे? मरीज अस्पताल जाए तो कैसे? राशन आए तो कैसे?
किसी शहर में सड़क पर गड्ढा हो जाए तो लोग शिकायत करते हैं।किसी गांव में कुछ घंटों के लिए रास्ता बंद हो जाए तो प्रशासन सक्रिय हो जाता है।
लेकिन यहां ग्रामीणों का दावा है कि समस्या वर्षों पुरानी है।बारिश आती है तो रास्ते की चिंता शुरू हो जाती है।माता-पिता सोचते हैं कि बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे।किसी घर में कोई बीमार पड़ जाए तो परिवार पहले अस्पताल की चिंता नहीं करता, पहले यह सोचता है
नाला कैसे पार होगा?
और अगर एंबुलेंस को फोन किया जाए तो सवाल खड़ा हो जाता है.क्या एंबुलेंस गांव तक पहुंच पाएगी?यह सवाल किसी भी संवेदनशील व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर होना चाहिए।एक महिला को कंधे पर ढोने की तस्वीर पूरे सिस्टम से सवाल कर रही है झेलेगी में मरीज की तस्वीर सिर्फ एक परिवार की मजबूरी नहीं दिखाती।यह तस्वीर पूछती है
जब सरकार की 108 एंबुलेंस गांव-गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था है, तो क्या सड़क और पुलिया के अभाव में किसी मरीज को कंधे पर ढोना हमारी व्यवस्था की मजबूरी बन जानी चाहिए?
क्या किसी ग्रामीण को यह सोचना चाहिए कि बीमार पड़ने के बाद अस्पताल तक पहुंचना उसके भाग्य पर निर्भर है?क्या किसी मां, बहन, बुजुर्ग या बच्चे को सिर्फ इसलिए इलाज में देरी झेलनी पड़े क्योंकि उसके गांव के सामने पुलिया नहीं है?
ग्रामीणों का दावा,25 साल से सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों का आरोप है कि बम्हनी नाले पर पुलिया की मांग आज की नहीं है।करीब 25 साल से सड़क और पुलिया की मांग उठाई जा रही है।इस दौरान कई बार आवेदन दिए गए।कई बार अधिकारियों से मुलाकात की गई।जनदर्शन में समस्या रखी गई।
चुनाव के दौरान भी मुद्दा उठाया गया।लेकिन ग्रामीणों के अनुसार समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं हुआ।ग्रामीणों का कहना है कि वे आश्वासन सुनते-सुनते थक चुके हैं।अब उनकी मांग में गुस्सा कम और टूट चुकी उम्मीद की आवाज ज्यादा सुनाई देती है।हमें विकास नहीं चाहिए’ नहीं… ग्रामीण कह रहे हैं ‘बस रास्ता दे दो’इन ग्रामीणों की मांग कोई बड़ी इमारत नहीं है।कोई महंगा अस्पताल नहीं।
कोई आलीशान सड़क नहीं।वे सिर्फ चाहते हैं कि बारिश में उनका गांव बाकी दुनिया से कटे नहीं।
वे चाहते हैं कि एंबुलेंस मरीज तक पहुंच सके।
वे चाहते हैं कि बच्चे स्कूल जा सकें।
वे चाहते हैं कि राशन गांव तक पहुंच सके।
वे चाहते हैं कि किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिवार को उसे कंधे पर न उठाना पड़े।
यानी मांग सिर्फ एक पुलिया की है, लेकिन उससे जुड़ी है पूरी जिंदगी।पहाड़ी कोरवा परिवारों की बेबसी ने खड़े किए बड़े सवाल
विशेष पिछड़ी जनजाति के परिवारों तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने को लेकर लगातार योजनाएं संचालित की जाती हैं। लेकिन सरगवां की ये तस्वीरें जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती हैं।
एक तरफ विकास योजनाओं और सुविधाओं की बात होती है।दूसरी तरफ जमीन पर एक बीमार महिला को झेलेगी में उठाकर ले जाने की मजबूरी सामने आती है।एक तरफ सड़क संपर्क बढ़ाने की बात होती है।दूसरी तरफ ग्रामीण हाथ में थाली लेकर पुलिया मांगते दिखाई देते हैं।फर्क सिर्फ इतना है कि सरकारी कागजों में रास्ते हो सकते हैं… लेकिन ग्रामीणों की जिंदगी में रास्ता अभी भी अधूरा है।
अब प्रशासन से ग्रामीणों की सीधी मांग
ग्रामीणों की मांग है कि बम्हनी नाले पर जल्द से जल्द पुलिया निर्माण कराया जाए और सड़क संपर्क को दुरुस्त किया जाए।साथ ही ग्रामीण चाहते हैं कि जब तक स्थायी पुलिया का निर्माण नहीं होता, तब तक बारिश के दौरान आवागमन और मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।
क्योंकि अगली बार कोई बीमार पड़ेगा तो शायद उसके पास झेलेगी भी न हो।
और अगली बारिश में नाला कितना उफनेगा, इसका भरोसा भी किसी को नहीं।अब सवाल सिर्फ पुलिया का नहीं… इंसान की जिंदगी का है सरगवां से सामने आई ये दोनों तस्वीरें अपने आप में पूरी कहानी कहती हैं।एक तस्वीर,बीमार महिला की।
जिसे इलाज के लिए जाना था, लेकिन सड़क नहीं मिली।दूसरी तस्वीर,ग्रामीणों की।जिन्हें विकास मांगना था, लेकिन 25 साल बाद उनके हाथ में थाली आ गई।एक तरफ कंधे पर मरीज…दुसरी तरफ हाथ में थाली.और बीच में वही बम्हनी नाला।अब सवाल यह नहीं है कि पुलिया कब बनेगी।सवाल यह है कि,,
क्या किसी मरीज की जिंदगी खतरे में पड़ने के बाद प्रशासन जागेगा?क्या किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार किया जा रहा है?क्या 25 साल का इंतजार 26वें साल में भी जारी रहेगा?या फिर सरगवां के ग्रामीणों की थाली की आवाज इस बार जिम्मेदारों तक पहुंचेगी?क्योंकि जिस गांव में मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए कंधों का सहारा लेना पड़े और विकास मांगने के लिए लोगों को थाली लेकर सड़क पर बैठना पड़े… वहां समस्या सिर्फ पुलिया की नहीं होती, समस्या उस व्यवस्था की होती है जो वर्षों तक लोगों की आवाज सुन नहीं पाती।
अब देखना होगा कि इन तस्वीरों के सामने आने के बाद प्रशासन कितनी जल्दी हरकत में आता है और बम्हनी नाले पर पुलिया निर्माण की दिशा में क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।















