बलरामपुर@जिले के कुसमी तहसील क्षेत्र से जमीन के नाम पर कथित फर्जीवाड़े का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल ग्रामीणों को हैरान कर दिया है, बल्कि राजस्व अभिलेखों की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जिस व्यक्ति की मौत करीब 13 साल पहले हो चुकी थी, उसके नाम पर वर्षों तक जमीन राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज रही और फिर अचानक एक दूसरे व्यक्ति ने कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कर खुद को मृतक का पुत्र बताते हुए जमीन अपने नाम दर्ज करा ली।
मामला ग्राम पंचायत जिगनियां के पारा अंबाकोना का बताया जा रहा है। इस संबंध में ग्रामीणों ने कुसमी अनुविभागीय अधिकारी राजस्व को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
13 साल पहले हो चुकी थी मौत, फिर भी रिकॉर्ड में चलता रहा नाम
शिकायत के अनुसार ग्राम जिगनियां के पारा अंबाकोना में शामिल खाते की जमीन राजस्व अभिलेखों में लोया आ० चकिया के नाम दर्ज थी। बताया जा रहा है कि लोया की मृत्यु वर्ष 2012 में ही हो चुकी थी। इसके बावजूद वर्ष 2025 तक राजस्व रिकॉर्ड में जमीन लोया के नाम पर ही दर्ज रही।
ग्रामीणों का कहना है कि मृतक की मृत्यु के बाद जमीन के वारिसों की जानकारी राजस्व रिकॉर्ड में नियमानुसार दर्ज होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद आरोप है कि इसी स्थिति का फायदा उठाकर ग्राम जलबोथा निवासी गोवर्धन पिता लेड़ग ने कथित रूप से मृतक के नाम और दस्तावेजों से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल करते हुए जमीन अपने नाम कराने की कोशिश की।
मृतक का बेटा बनकर नाम चढ़ाने का आरोप
शिकायतकर्ताओं का सबसे गंभीर आरोप यह है कि गोवर्धन ने कथित रूप से लोया की मृत्यु का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार कराया और अपने लिए फर्जी आधार कार्ड बनवाकर खुद को मृतक का पुत्र दर्शाया। आरोप है कि बिना वास्तविक वारिस को सूचना दिए राजस्व अभिलेख में उसका नाम दर्ज करा दिया गया।
ग्रामीणों के मुताबिक लोया का कोई पुत्र नहीं था। उनकी एक पुत्री थी, जिसका विवाह गोपातु में हुआ था और वह आज भी जीवित है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि मृतक का कोई पुत्र था ही नहीं, तो आखिर किस आधार पर गोवर्धन को उसका पुत्र बताकर जमीन के रिकॉर्ड में नाम दर्ज किया गया?
पुराने दस्तावेज भी खोल रहे हैं कई सवाल
शिकायत में वर्ष 2003 की मतदाता सूची का भी हवाला दिया गया है। ग्रामीणों का दावा है कि उस मतदाता सूची में गोवर्धन के पिता, पत्नी और भाई सहित परिवार के अन्य सदस्यों के नाम दर्ज हैं और वहां पिता के नाम के रूप में लेढ़गा का उल्लेख है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि पुराने दस्तावेजों में पिता का नाम अलग होने के बावजूद अचानक किसी मृत व्यक्ति का पुत्र बनकर जमीन अपने नाम कराने का दावा किया जाना गंभीर जांच का विषय है।
यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सिर्फ जमीन के नामांतरण का मामला नहीं रहेगा, बल्कि कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार करने, सरकारी अभिलेखों में गलत जानकारी प्रस्तुत करने और वास्तविक वारिस को उसके अधिकार से वंचित करने का गंभीर मामला बन सकता है।
कहीं राजस्व अमले की मिलीभगत तो नहीं?
इस पूरे मामले में ग्रामीणों ने कुछ भू-अभिलेखीय कार्य से जुड़े लोगों की भूमिका पर भी संदेह जताया है। हालांकि यह आरोप अभी जांच का विषय है और इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। ग्रामीणों का कहना है कि आखिर बिना किसी वारिस को सूचना दिए और बिना वास्तविक दस्तावेजों की जांच के किसी व्यक्ति का नाम मृतक की जमीन पर कैसे दर्ज हो गया?
यही सवाल अब कुसमी के राजस्व विभाग के सामने भी खड़ा है।
जिसका सहारा होना था, उसी जमीन को लेकर परिवार परेशान
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जिस जमीन को मृतक के परिवार की विरासत और भविष्य का सहारा होना चाहिए था, उसी जमीन को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। वर्षों तक राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नाम के बावजूद यदि अचानक किसी दूसरे व्यक्ति का नाम फौती नामांतरण के जरिए दर्ज हो जाए, तो आम ग्रामीण के लिए यह स्थिति कितनी पीड़ादायक और भयावह हो सकती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कागजों के खेल में असली हकदार पीछे छूट गया और कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के सहारे जमीन पर दावा करने वाला व्यक्ति सामने आ गया।
SDM से निष्पक्ष जांच और नाम विलोपित करने की मांग
ग्रामीणों ने कुसमी एसडीएम से मांग की है कि पूरे मामले की बारीकी से जांच कराई जाए। मृतक लोया की मृत्यु, उनके वास्तविक वारिस, वर्ष 2003 की मतदाता सूची, आधार संबंधी दस्तावेज और फौती नामांतरण से जुड़े सभी राजस्व रिकॉर्ड की जांच की जाए।
साथ ही शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि यदि दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं तो संबंधित व्यक्ति और इस प्रक्रिया में संलिप्त लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए तथा राजस्व अभिलेख से गोवर्धन पिता लेड़ग का नाम विलोपित कर वास्तविक हकदार के नाम जमीन दर्ज की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 13 साल पहले दुनिया छोड़ चुके व्यक्ति को कागजों में दोबारा ‘वारिस’ मिल गया? क्या फर्जी दस्तावेजों के सहारे किसी की जमीन पर कब्जे का रास्ता तैयार किया गया? और यदि ऐसा हुआ तो इस पूरी प्रक्रिया में किन-किन लोगों की भूमिका रही?
इनके या इन सवालों के जवाब अब प्रशासनिक जांच के बाद ही सामने आएंगे। फिलहाल शिकायत के बाद मामला अधिकारियों के संज्ञान में पहुंच चुका है और ग्रामीणों की नजर अब प्रशासन की कार्रवाई का इंतजार किया जा रहख है।















